Friday, April 30, 2010

दर्द-ए-बया


बंद..... जो लोगों को सुनने में बहुत ही साधारण सा शब्द लगता हो....तो ये शब्द कुछ लोगों के लिए आराम का दिन होता हो.... और युवाओं के लिए सैर सपाटे का दिन हो...बंद जो नेताओं का सबसे बड़ा अस्त्र है तो वही सत्ताधारी दल के लिए किसी जहर बुझे तीर से कम नहीं होता...आये दिन समाचार पत्रो में..न्यूज चैनलों में बंद शब्द की ढेर सारी विवेचना सुनने को मिलती है....किसी को थप्ड़ मार दिया तो शहर बंद...हत्या हुई तो दुकाने बंद....मंहगाई से कमर टूट रही है तो भारत बंद....कितना आसान होता है...इस शब्द के अर्थ को सार्थक करना....लेकिन दो अक्षरों से निर्मित ये शब्द कितना विभत्स परिणाम दिखाता है....क्या कभी इस पर भी गौर किया गया...
बंद का असर बंद दुकाने..तोड़ फोड़..मारा पीटी और गाली गलौच...लोगों के व्यापार पर असर..गरीबों के लिए खाने के लाले.......शायद कुछ ऐसा ही होता है बंद का परिणाम...जऱा सोचिए जब सारा कारोबार...ठप्प होता है...हिसां के डर से लोग घरों में बैठे.....ऐश के साथ चाय पकौड़े खाते है..तो इस स्थिती में ये बेचारे रेहड़ी-खोमचे वाले मजदूर जिनकी कमाई रोज़ कमाओं-रोज़ खाओं वाली होती है तो वो भला कैसे करते होगे अपना गुजर बसर......और अगर पापी पेट के लिए दुकान लगा ली तो कमाई में मिलती है...टूटी हुई दुकान और सड़क पर बिखरे पड़े सामन...इन नेताओं के अस्त्र से बेवजह मारे जाते है तो सिर्फ गरीब जनता...
सच भी है इन गरीब जनता के वोटों से सदन तक पहुंचे ये नेता.....खादी पहनते ही इन गरीबों के दुख को भूल इनकी ही गर्दन पर चाकू चलाने लगते है....और इस माहौल में हतप्रभ स्थिती में खड़ा....अपने को सबसे ज्यादा छला जाने वाला ये गरीब अपनी टूटी दुकान.....और बिखरे सामान के साथ बस यही सोचता है कि.....किसने जलाई बस्तियां बाज़ार क्यूं लूटे में चांद पर गया था....मुझे कुछ खबर नहीं.....
सौरभ कु. मिश्र
(मिश्र गोरखपुरिया)

Monday, April 26, 2010

दास्ताने भोपाल…….

मुझे बात याद आती है..जब मै पहली बार भोपाल में आया..शहर जैसा सुना था उससे भी कही ज्यादा सुन्दर था....हर तरफ सिर्फ प्रकृती का खुलापन...ये हरयाली देखकर कोई भी अनायास ही कह पड़ेगा कि...शहर नही जन्नत है...पर समय की सुई जिस तरह आगे बढ़ती गयी..शहर के आबों फिज़ा में जाने कौन सी हवा घुल कि...इसकी ये चौतरफा खुशिया धिरे-धिरे धूमिल पड़ने लगी.....आज जहां एक तरफ अपराध दिन-ब दिन तेजी के साथ अपना पांव पसार रहा है....तो वही सरकार भी विकास के पथ पर इस कदर अग्रसर हो रही है कि...पेड़ों से लेकर घरों तक का अंधाधुंध खात्मा कर रही है..और कारण बन रहा है अतिक्रमण और विकास....शहर में ऐसी कई जगहें थी जहां पर इतने पेंड थे कि..सड़कों तक धूप को आने में काफी मशक्कत करनी पड़ती थी.....लेकिन आज उन सड़को पर धूप ने अपना एक छत्रराज कायम कर लिया है केन्द्र बिन्दु में जो कारण है वो फिर वही विकास की गति और अतिक्रमण......खैर ये तो हुई शहर के पेड़-पौधो का हाल..जिनके बारे में सोचकर मन बहुत दुखी होता है....लेकिन एक बात और है जो इन दिनों दिल में टीस पैदाकर रही है....वो है सरकार के द्वारा चलाया जा रहा अतिक्रमम विरोधी अभियान.......अतिक्रमण को जड़ से मिटाने के लिए सरकार की इस मुहिम में जाने कितने लोगों के आशियाने को तहस नहस कर दिया...लोगों के गाढ़ी कमाई अब धूल फांक रही है....लोग घर से बेघर हो गये...मजबूर है इस चिलचिलाती धूप और खुले आसमान के नीचे जिंदगी गुजर करने के लिए.... तितर बितर पड़े इन सामान को देखकर बेबस ही ये पक्तियां याद आ जाती है कि.....लोग टूट जाते है इक घर बनाने में तुम तरस नही खाते बस्तियां जलाने में..... पर जो बात ज़ेहन में आ रही है....कि कितना अच्छा होता कि सरकार जो चुनाव के समय इन बस्तियों को बसाने की इजाज़त देती है...अगर चुनाव के बाद भी इन्हें वही बसे रहने दे तो .....कितना अच्छा होता कि चुनावी वादों की तरह सरकार इन परिवारों पर कहर गिराना भी भूल जाये....लेकिन सोचने वाली बात तो यह है कि अगर घर उजाड़ने का ही काम करना है... तो फिर बसा कर वाहवाही क्यों लूटना....क्यू कसूरवार बनना इन रोते बिलकते मासूमों और खून के आंसू रोते इन बेघर परिवारों का....क्या चुनाव के बाद सरकार ये बात भूल जाती है कि..... वो इन जनता के दम पर ही......सत्ता की कुर्सी पर आरूढ़ होकर इसका रसास्वादन कर रही है........इस बात पर बशीर बद्र ने क्या खूब लिखा है कि....दुश्मनी करों तो जमकर करों लेकिन इतनी गुंजाइश रहे.....कि अगर दोस्त बन जाये तो शर्मिदा ना होना पड़े.....

SAURABH K. MISHRA

(mishra gorakhpuriya)

Monday, April 12, 2010

भूखे पेट हरि भजन ना होई


शिक्षा सभी के अनिवार्य है..सब पढ़े सब बढ़ा और 6 से 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना...ये ऐसी तमाम बाते है..जिन पर नेता आये दिन राजनीति करते रहते है.....शिक्षा के इस मुद्दे पर इतनी बार बहस हो चुका है..कि अब ये खास मुद्दा आम हो गया है....देश में इसी तरह के बहुत से मुद्दे है..जिन पर नेतागण इस तरह की वोट की राजनीती करते है जिसके चलते जनता के ये बहुत ही खास मुद्दे आम बन कर रह जाते है....एक ऐसा ही वोट बैंक को बढाने वाला मामला भूखमरी का ....जो नेताओं के बीच खासा लोकप्रिय भी है........जो आये दिन धुए की तरह दिखाइ तो देता है...लेकिन बादल बन कर गायब भी हो जाता है...सच कहें तो ये मुद्दा भी मौसमी हो चुका है....लेकिन वाकई इस बात पर गहराई के साथ विचार करें तो...ये काफी विभत्स रूप में हमारे सामने खड़ा हो रहा है....मैंने एक लेख पढ़ा था जिसमें पूरे विश्व को भूखों की दुनिया से नवाजा गया था...सच्चाई भी यही कहती है...क्योकि सरकार हर क्षेत्र की उन्नति के लिए तमाम उपाय करती है लेकिन....जाने ये लोग (मंत्री और आला अफसर) किसने भूखे है कि....रोटी से लेकर चारा तक को हजम कर जाते है। और जिन तक पहुंचना होता है वहां तक नहीं जा पाता है.....
भूख जो इंसानी रूह को कपा देती है। भूख जो अच्छे व्यक्ति को बुरा बनने पर मजबूर कर देती है। भूख ही है जो संसार में असंतोष के बीज पैदा करती है। जी हां मैं बात कर रहा हूं विश्व में फैले भूखमरी की। जिसने सभी देशों में हाहाकार मचा कर रख दिया है...जिसके चलते विकास के सारे दावे फेल हो रहे है। 2009 में आये आकड़ों की बात करे तो भूखमरी से विश्व के लगभग 1 अरब लोगों को लील लिया. जिसमें से करीब 1 करोड़ तो भारत के ही है। ये आकड़े नेताओं द्वारा चुनाव में किये गये बड़े-बड़े वादो और घोषणाओं की पोल खोलते है। साथ ही भ्रष्टाचारियों के मुंह पर करारा तमाचा भी मार रहे है। सबसे ज्यादा कम वजन के बच्चे,सबसे अधिक कुपोषित नौनिहाल,बेरोजगार,और गरीबों की फौज से भरा पड़ा ये भारत देश वाकई अतुल्य भारत कहा जाना चाहिए। सरकार की नीतियों और भ्रष्ट्राचारियों के कारण गरीरों और अमीरों के बीच की खाई इतनी गहरी हो गयी है कि इसे पाटना नामुमकिन है। सच्चाई तो यह है कि विश्व की कुल भूखी आबादी का ज्यादादर हिस्सा विकासशील देशों में गुजर बसर कर रहा है। करीब 65प्रतिशत से ज्यादा भूखे-नंगे लोग सिर्फ इन देशों बाग्लादेश,भारत,चीन,इंडोनेशिया,और पाकिस्तान में शामिल है। शायद यह सब इन देशों के लिए किसी उपलब्धि से कम नही है।
चौड़ी सड़के. चमचमाती कोरों की कतार,ग्रहों तक पहुंचने की होड़.शेयर बाजार की उछाल,मॉल का धमाल,आर्थिक विकास दर को पाने की ललक शायद यही सब तो है प्रगति के सूचक। तो वही सूखा और बाढ़ ,बढ़ती गरीबी और भूखमरी का शिकार होते लोग, साथ ही आसमान छूती मंहगाई,आत्हत्या करते किसान,आतंकवाद,नक्सलवाद,लिंग भेद आदि ऐसे तमाम मामले है ..जो अंतराष्ट्रीय मंचों पर देश की मट्टी पलीद करने के लिए काफी है। जब हम बात भूखमरी की कर रहे है तो उपज और जनसंख्या को दरकिनार तो कर ही नहीं सकते है।पिछले एक दशक से अनाज का उत्पादन उतना ही बना हुआ है। साल 1990-91 के सालो में कुल उत्पादन 17.64 करोड़ था। जो दो दशक के बाद 22.98 करोड़ रहा है। यानि इन बास सालों के दौरान जहां जनसंख्या 1.5 करोड़ वार्षिक की दर से बढ़ बढ़ रहा है तो वही अनाज का उत्पादन नगण्य रहा। सरकार की तो पूछो ही मत....आम जनता की सबसे बड़ी हितैषी बनने का दावा करती है..तमाम नीतियां, योजनाओं, घोषणाओं का अम्बार लगा देती है। लेकिन उसके बावजूद भी चालू किये गये तमाम योजनाओं के निष्कर्ष टॉय-टॉय फिस्स होता है। सरकार ने बेरोजगारी दूर करने के तमाम योजनायें लाती है..जैसे महात्मां गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, काम के बदले आनाज की योजना लेकिन इन सभी योजनाओं पर गौर फरमायें तो ये सभी भ्रष्टाचार के दानव को बलि की भेंट चढ़ गयी। गांधी जी ने एक बात कही थी कि भूखों के लिए रोटी ही भगवान है..संविधान में भी इस बात को कहा गया हा कि पृथ्वी पर पैदा होने वाले हर इंसान को भोजन प्राप्त करने का अधिकार है....लेकिन वर्तमान वैश्विक हालात को देखते हुए तो ऐसा ही कहा जा सकता है कि..पैसा जिसके पास है,भोजन उसके हाथ है...।आज भ्रष्ट्राचार बढ़ती भूखमरी,बेरोजगारी को देखकर ज़ेहन में एक ही बात कौधती है कि आखिर इसका हल क्या होगा? क्योकि भूखे पेट तो हरि भजन नहीं हो सकता । तो फिर समाज, देश की उन्नति कैसे की जायेगी.?आने वाले दिनों में अगर भारत को महाशक्ति के रूप में सामने आना है तो उसे अपने बुनियादे ढ़ाचे पर अधिक मजबूती के साथ ध्यान देना होगा। जब पेट में कुछ जायेगा तो ही आवाज बाहर आयेगी और देश राष्ट्र की बात भी की जायेगी...क्योंकि जिन्दगी बहुत अनमोल है..औऱ हर जीवन का आपना एक उद्देश्य है...
जय हिंद जय भारत सौरभ कुमार मिश्र
(मिश्र गोरखपुरिया)

Wednesday, January 27, 2010

नेताओं का व्यवहार और मंहगाई की मार


किसी का हाथ आम जनता के साथ....तो कोई इंडिया शाइनिंग के सगूफे छोड़ता हैं......पर मूल में सभी के एक ही बात सामने आती है...कि देश की सभी पर्टियों का मेन मोटो गरीबों और आम जनता के विकास की ही बात करना है......लेकिन शायद उनकी मजबूरी होती है कि वो चुनाव जीतने के बाद ये सब वादे भूल जाते है.....क्या करे उनकी गलती नहीं बल्कि वो तो पार्टी और अपने नेता परम्परा का निर्वहन करते हैं......भारतीय राजनीति में शायद ऐसी परम्परा बन गयी है कि चुनाव के समय जनता से खूब लुभावने वादे करना और फिर जीतने के बाद वादों को ऐसे भूल जाना.....जैसे गजनी के नायक को हर बाते सिर्फ थोड़े देर ही याद रहती है....अरे मै भी कहां देश के राजनीति में फंसा हूं...मेंडलीफ के आवर्त सारणी के कुछ अपवादों को छोड़ दे तो आज कौन युवा है जो देश के हित की बात सोचता है.....उसे तो बस अपने लाभ से मतलब है..और शायद यही कारण है कि आज देश की ज्वलंत समस्या मंहगाई पर लोग एक साथ खड़े है....और सरकार को उसके किये चुनावी वादे बखूबी याद दिला रहे हैं.....जो भी हो लेकिन उनका ये कदम सराहनीय ही कहा जायेगा.....देश की सरकार तो देश के विकास दर के पीछे भाग रही है...लेकिन इस भागम-भाग में उसे इस बात का इल्म नही कि देश में मंहगाई कहां जा रही है...देश की जनता मंहगाई से कितनी त्रस्त है....उसे तो बस अपना पल्ला झाड़ना अच्छी तरह आता है...एक अपनी गलती को विपक्ष पर थोपता है तो दूसरा सरकार पर ...इस आरोप-प्रत्यारोप के खेल में मंहगाई कब आसमान छूने लगी...इस बात का अंदाजा तब लगा जब इसके विरोध में आम जनता सड़को पर उतरने लगी..बर्दाशत भी कबतक करती....क्योकि छोटी होती थाली के बाद अब फीकी और काली होती चाय को गले से उतारना जनता के लिए बहुत मुश्किल हो रहा था...भला हो सरकार का जिसने जनता के दर्द को समझा ..और आनन-फानन में बात आर बी आई के कानों तक पहुंचा दी गई....क्या करे जनता समझती है कि देश के आर्थिक डाक्टर यानी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी टीम देश को इस तरह की समस्याओं से उबारने में सक्षम है...लेकिन अंत में कमान सम्भाली आर बी आई ने ही......और मंहगाई पर चलाया अपना पहला ब्रम्हास्त्र सी आर आर....जिसके साथ ही लोगों की नजरे अब इसके सटीक निशाने की ओर गड़ गयी है...सी आर आर बैकों के जमा राशि का वह हिस्सा होता है...जो बैंको को रिर्जव बैक के पास अनिवार्य रूप से रखना पड़ता है....जिसके बाद बैकों के पास तरलता की कमी होती है और लोगो को बढ़े हुए ब्याज दर पर ऋण लेना पड़ता हैं...जो की इस मंहगाई में जनता के लिए तो मुश्किल ही है...अगर अखबारों के पुराने पन्नों को पलटे तो पायेगें कि......9 जनवरी को समाप्त हुए सप्ताह में खाद्य वस्तुओं पर आधारित मुद्रास्फिति की दर 16.81 फीसदी रही.. तो वही थोक मूल्य सूचकांक 7.31 फीसदी रही ....ये आंकड़े गिरावट के बाद के है.....लेकिन इसके बाद भी आम जनता को कोई भी सहूलियत नहीं है...मंहगाई को लेकर उनकी स्थिती ज्यों की त्यों बनी हुई है.... अभी भी थाली छोटी की छोटी है और चाय की कड़वाहट भी बरकरार है... इसी बीच एक खबर आयी कि लोग आमरण अनशन पर जाने को तैयार है...हां जब खाने के लिए घर में राशन ही नहीं होगा तो फिर वो आमरण ही तो कहलाएगा......लेकिन इन सभी कयासों और इस मंहगाई की आग में झुलसी हुई. ये जनता ......आने वाले बजट के मरहम का इंतजार कर रही हैं...कि शायद इस बार कुत्तों के खाने वाले बिस्कुट की जगह.....इंसानों के खाने का राशन सस्ता हो जाये.....
सौरभ कु. मिश्र (मिश्र गोरखपुरिया)
(लेख अखबार और समाचार के खबरों के आधार पर)

Sunday, December 13, 2009

द शो मस्ट गो आन...........


आज महान कलाकार.....और बालीबुड के शोमैन रणबीर राजकपूर जी की......85 वीं जन्मदिन पूरे देश में मनायी जा रही हैं.......राजू......यानि राजकपूर.....जिन्होनें भारतीय सिनेमा को एक नयी दिशा दी....... और बालीबुड को पहुंचा दिया नयी बुलंदियो पर........ पेश है उनके जीवन के सफर पर एक खास रिर्पोट.........
शौमेन राजकपूर आज......बालीबुड के किसी भी कलाकार के लिए भगवान से कम नहीं हैं.......आज भी लोग उनके जीवन के हर पहलू से कुछ ना कुछ सीखते ही रहते हैं..... 14 दिसंबर 1924 को पेशावर में जन्मे रणबीर राजकपूर....जीवन भर अपने पिता के आदर्शो के साथ जिये......जिसने उन्हें बुलंदियों का रास्ता दिखाया......उनके पिता ने उनसे एक बात कही थी कि.....बेटा अगर निचे से शुरू करोगें.....तो बहुत आगे जओगे......और शायद यही वो बात थी.....जिसने राजकपूर साहब को राजू से शौमैन बनाया......
राजकपूर जैसे महान कलाकार ने.....अपने शुरूआती दिन.... रणजीत मूवीटोन से एक अपरेंटिस....और क्लैपर के रूप में शुरू की...... यही क्लैपर बॉय राजू 1947 में केदार शर्मा की फिल्म नीलकमल का नायक बन गया...... इस फिल्म से पहले भी.... राजू अपने हुनर को रजत पटल पर दिखाता रहा......लेकिन फिल्म नीलकमल से शौमैन का.....राजू से राजकपूर बनने का सफ़र शुरू हो गया था.......पहली बार 1948 में.....महज 24 साल की उम्र में.....परदे के पिछे गये........और हिंदी सिनेमा के सबसे युवा फिल्म-निर्देशक के तौर पर सामनें आयें.........बाद में आर के स्टूडियों के नाम से खुद का स्टूडियों शुरू किया...... राजकपूर एक उम्दा निर्देशक..... जो एक बेहतरीन अभिनेता था... निर्माता था... साथ ही साथ गीत-संगीत और तकनीक जैसे न जाने कितने पहलुओं का ज्ञाता था...... जिसकी टीम में मुकेश.... शंकर-जयकिशन,...नर्गिस... मन्ना डे... और शैलेन्द्र जैसे बेहतरीन फनकार थे.....
राजकपूर ने अपने आप को समाज से हमेशा जोड़े रखा...... यही वजह है की उनकी फिल्में प्रगतिशील आन्दोलन की मजबूत धुरी बनीं........ उनके फिल्मों के सफलता की कहानियां तो न जाने हमारी कितनी पीढियां सुनेंगी......सही मायने में राजकपूर एक ऐसा इनसाक्लोपिडियां हैं..... जिसके संग्रह में आग...आवारा... बूट-पोलिश...बरसात...जागते रहो....संगम... मेरा नाम जोकर..... प्रेम-रोग.... और बॉबी जैसी नायब फिल्में हैं......... उनकी फिल्में युवाओं में नर्म दिल को झकझोर देने का माद्दा रखती हैं.........और समाज के निष्ठुर कलेजे पर तीखी चोट भी करती हैं........ उनकी फिल्मों का सन्देश.....और उनकी फिल्मों के गीत लोगों की जुबां पर पीढी-दर-पीढी आगे बढ़ते ही रहते हैं.......
कपूर खानदान ने बेशक इंडस्ट्री को एक से एक नायाब सितारे दिए हैं..... लेकिन इनमें राजकपूर सबसे चमकीले तारे है.....जिनकी रौशनी से ये फिल्म जगत रौशन हो रही हैं......और आगे भी सदियों तक होता रहेगा..... 2 जून 1988 को राजकपूर भले ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया.....लेकिन उनकी फिल्में और उनका काम आज भी यही कह रहा है......... कि द शो मस्ट गो आन...........
सौरभ कु. मिश्र.......(गोरखपुरिया)

Saturday, December 12, 2009

बैंक सार........



कॉलेज के दिनों में एक कहानी सुनी थी.....जिसमें एक बैंक कुछ ही घंटों में ताश के पत्तों की तरह ढह गया.......कहानी कुछ ऐसी थी कि......एक बैंक का चपरासी जिसको अपनी घड़ी पर बहुत भरोसा था...और वह उसी के टाईम से बैंक आता था........एक बार किसी ने उसके घड़ी के साथ किसी ने छेड़खानी कर दी....और टाईम को तीन घंटे आगे कर दिया.....चपरासी रोज़ की तरह की अपनी घड़ी देखकर बैंक आया और अपना काम करने लगा.....काम खत्म करने के बाद उसे लगा कि.... आज क्या बात है...कि मुझे काम खत्म किये घंटे से भी ज्यादा का समय हो गया हैं......लेकिन अभी तक बैंक कर्मचारी नहीं आयें ......कहीं ऐसा तो नहीं कि बैंक का दीवाला निकल गया और कर्मचारी फरार हो गयें.....ऐसा सोंच कर वह चपरासी भी चिल्लाता हुआ भागा कि........बैंक का दीवाला निकल गया...बैंक भाग गया......मुझको धोखा दे दिया......... उस की ये बात जब बैंक ग्राहकों के कानों में पड़ी.... तो उनमें हड़कंप मच गया.....और सब बैंक की तरफ अपना पैसा लेने के लिए भागे..... धिरे-2 ग्राहकों का जमावड़ा लग गया...और सब ने अपने पैसों के लिए तोड़-फोड़ शुरू कर दी.....बैंक कर्मी जब आये और इस नजारें को देखा तो दंग रह गये..... समस्या को जानने के बाद लोगों को समझाने की कोशिश की ...लेकिन तीर कमान मे निकल चुका था.......लाख कोशिशों के बाद भी लोग अपने पैसें के तुरंत भुगतान पर डटे रहे.....परिणाम ये हुआ कि बैंक इतनी जल्दी सभी का भुगतान न कर सका और ताश के पत्तों की तरह ढह गया......
आप सोच रहे होगें की मैंने ये सार आप लोगों के सामनें क्यों रक्खा....तो बात बस इतनी सी हैं.......कि इस समय भी बैंको की स्थिती कुछ ऐसी ही हैं......वो कर्ज, लोन,आदि तमाम तरह से ग्राहकों को मुद्रा का वितरण तो कर देती हैं....लेकिन तत्काल पूरे पैसों का भुगतान नहीं करती.. कोई ना कोई स्कीम के व्दारा ग्राहकों को उलझा कर रखते हैं....और उसी पैसों को चक्रीय क्रिया के साथ आगे बढ़ाते रहते हैं.....मगर सोचिए..... अगर यहां भी कुछ कहानी के तहत ही घट जाये तो............? ये बाते मैं स्वविवेक से बता रहा हूं क्योकि कभी भी.. कहीं भी.. कुछ भी.. हो सकता हैं......तो मेरे इस बक-बक करने का बस इतना सा सार हैं कि..... वर्तमान समय में हम जिस तरह से वित्तीय संकट से गुजर रहे हैं....... उस स्थिती में जनता से लेकर बैंको तथा नियामक संस्थाओं तक को.... आख,कान और दिमाग खोल कर काम करना पड़ेगा.......
आपका
सौरभ कु. मिश्र(लेखक के स्वविवेक से गढ़ी गयी....)

Friday, December 11, 2009

तेल का उबाल.......


सरकार की मंहगाई कम करने की नीति कुछ ऐसी है...जैसे की गरीबी हटाने की...जिसमें गरीबी तो कम लेकिन गरीब जरूर कम होते जा रहे हैं...... सच कहे तो सरकार अपने ही नीतियों में उलझ कर रह गयी हैं....मुद्रास्फिती है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रही...पर सरकार अपने इन नीतियों के सफाई में बस इतना कह रही हैं कि हम प्रयास कर रहें हैं. पर समझने की बात ये हैं कि सरकार महगाई की आग शांत करने का प्रयास कर रही हैं या फिर आग में घी डालने का.. क्योकि बीते हफ्ते थोक मूल्य सूचकांक बढ़ कर लगभग 20 फीसदी हो गया.....जो मंहगाई को हाथ से निकलता हुआ बता रहा हैं। वही दूसरी तरफ कच्चे तेल के दाम ने इसमें तड़के का काम किया.. जो बढ़कर 140 डालर प्रति बैरल के पार पंहुच गया... जो ये चीख कर बता रहा हैं कि आने वाले समय में महगाई कम तो होने से रही। और अब इस पर भी अगर सरकार मंहगाई कम करने की बात कह रही हैं...तो ये जनता के आखों में धूल झोंकने जैसा ही होगा.
सौरभ कु. मिश्र